JVBI
JVBI Assistant
Online • Reply in 1 min
NAAC A Grade
ISO 9001:2015
34+ Years of Excellence
Apply Online
Call : 9461239683
News & Events
जापान में आयोज्य अंतरराष्ट्रीय अहिंसा संगोष्ठी में लाडनू के जैविभा विश्वविद्यालय का रहेगा प्रतिनिधित्व
07 Aug 2026
जापान में आयोज्य अंतरराष्ट्रीय अहिंसा संगोष्ठी में लाडनू के जैविभा विश्वविद्यालय का रहेगा प्रतिनिधित्व
आएसडी प्रो. अशोक जैतावत प्रस्तुत करेंगे शोध-पत्र, लाडनूँ, 07 अगस्त 2026। जापान के क्योटो विश्वविद्यालय में हैम्बर्ग विश्वविद्यालय के सहयोग से 26 अगस्त से 2 सितम्बर तक आयोज्य ‘अहिंसाः जैन अध्ययन और उससे आगे (Ahimsa: Non-Violence & Jain Studies and Beyond)’विषय पर आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने के लिए लाडनूं के जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय के कुलपति के ओएसडी (विशेष कार्याधिकारी) प्रो. अशोक जैतावत जापान जाएंगे। वे यहां से 18 अगस्त को जापान के लिए फ्लाइट से रवाना होंगे। इस अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में विश्व के अग्रणी विश्वविद्यालयों के प्रख्यात् विद्वान जैन दर्शन की शाश्वत प्रासंगिकता तथा अहिंसा के सार्वभौमिक महत्व पर विचार-विमर्श करेंगे। विशेषाधिकारी प्रो. अशोक जैतावत इस संगोष्ठी में ‘जैन उपवास एवं ऑटोफैजीः तपस्या परंपराओं और आधुनिक जैव-चिकित्सा विज्ञान के मध्य एक अंतर-सांस्कृतिक संवाद’ विषय पर अपना शोध-पत्र प्रस्तुत करेंगे। जिसमें वे जैन धर्म की प्राचीन उपवास परंपरा और आधुनिक जैव-चिकित्सा अनुसंधान के बीच संबंधों का विश्लेषण करेंगे तथा बताएंगे कि किस प्रकार जैन परंपराएं आज भी आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान और वैश्विक स्वास्थ्य संबंधी विमर्श को प्रेरित कर रही हैं। जैविभा विश्वविद्यालय की वैश्विक पहचान में एक कदम और संगोष्ठी में क्योटो विश्वविद्यालय, हैम्बर्ग विश्वविद्यालय, घंटे विश्वविद्यालय, टोक्यो विश्वविद्यालय, होक्काइडो विश्वविद्यालय, रयुकोकु विश्वविद्यालय सहित अनेक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शिक्षण एवं शोध संस्थानों के विद्वान भाग लेंगे। इस आयोजन का उद्देश्य धर्म, दर्शन, मानवशास्त्र, नैतिकता तथा प्राकृतिक विज्ञान जैसे विविध विषयों के माध्यम से अहिंसा के सिद्धांत का अंतर्विषयी दृष्टिकोण से अध्ययन एवं विश्लेषण करना है। जैन विश्वभारती संस्थान गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, अनुसंधान, प्रकाशन तथा अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहयोग के माध्यम से जैन दर्शन की समृद्ध विरासत के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार के लिए निरंतर कार्य करता रहा है। प्रो. जैतावत को प्राप्त यह अंतरराष्ट्रीय आमंत्रण विश्वविद्यालय की शैक्षणिक प्रतिष्ठा को और अधिक सुदृढ़ करेगा तथा जैन अध्ययन, अहिंसा और भारतीय ज्ञान परंपरा के क्षेत्र में भारत के अग्रणी संस्थानों में जैविभा विश्वविद्यालय की विशिष्ट पहचान को और मजबूत बनाएगा। यह जैन दर्शन, अहिंसा, शांति अध्ययन तथा अंतर्विषयी अनुसंधान के क्षेत्र में विश्वविद्यालय की वैश्विक स्तर पर उत्कृष्ट प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करता है। जैविभा विश्वविद्यालय परिवार ने प्रो. अशोक जैतावत को इस प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में सहभागिता एवं शोध-पत्र प्रस्तुति के लिए शुभकामनाएं देते हुए विश्वास व्यक्त किया है कि उनका यह योगदान विश्वविद्यालय की वैश्विक पहचान को और सशक्त करेगा तथा समकालीन वैश्विक चुनौतियों के समाधान में जैन दर्शन की स्थायी प्रासंगिकता को नई दिशा प्रदान करेगा।
Read more...
अप्रमत्तता व जागरूकता और विनयशीलता के गुणों से मिलती है शिक्षा में और जीवन में सफलता- युवाचार्य श्री महावीर कुमार,
07 Aug 2026
अप्रमत्तता व जागरूकता और विनयशीलता के गुणों से मिलती है शिक्षा में और जीवन में सफलता- युवाचार्य श्री महावीर कुमार,
लाडनूँ, 07 अगस्त 2026। युवाचार्य श्री महेन्द्र कुमार ने कहा है कि शिक्षा ग्रहण करने में पांच बाधक तत्व होते हैं, जिनका त्याग करना चाहिए। इनमें अहंकार, क्रोध, प्रमाद, रोग और आलस्य शामिल हैं। वे यहां जैन विश्वभारती संस्थान के आॅडिटोरियम में आयोजित युवाचार्य मनोनयन अभिनन्दन समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जहां अहंकार होता है, वहां शिक्षा का और जीवन का विकास संभव नहीं होता। विद्या विनयशील व्यक्ति को ही शोभा देती है। शिक्षा को मौलिक अधिकारों में शामिल किया गया है, जबकि प्राचीनकाल में पात्र को ही शिक्षा दी जाती थी, जो विनम्र होता हो। विनयशील ही शिक्षा के योग्य होता है, अहंकारी नहीं। उन्होंने क्रोध को भी शिक्षा के लिए घातक बताया और कहा कि गुस्सैल प्रकृति का व्यक्ति जीवन में कभी शिक्षा की ऊंचाइयां प्राप्त नहीं कर सकता। हर स्थिति में शांत रहने पर ही शिक्षा में व्यक्ति ऊंचाई प्राप्त कर सकता है। इसी तरह शिक्षा के लिए अप्रमत्तता और जागरूकता आवश्यक होती है। प्रमाद रखने से शिक्षा में वांछित सफलता नहीं मिल सकती। रोगग्रस्त व्यक्ति के लिए भी शिक्षा कठिन होती है। स्वस्थ्य व निरोग व्यक्ति ही शिक्षा की ऊंचाइयां प्राप्त कर सकता है। इसी तरह से आलस्य भी शिक्षा का शत्रु होता है। आलसी व्यक्ति दुनिया में कोई बड़ा काम नहीं कर पाता है। कुछ कर यकने के लिए उद्यमी होना आवश्यक होता है। इन पांचों दुर्गुणों से दूर रहने पर ही जीवन में शैक्षिक ऊंचाइयां प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने चरित्र को सबसे आवश्यक बताते हुए कहा कि धन चला जाता है, तो कोई खास नहीं जाता, लेकिन चरित्र की हानि होने पर व्यक्ति का सबकुछ चला जाता है। इसलिए चरित्र की रक्षा प्रयत्नपूर्वक करनी चाहिए। अहिंसा व अनेकांत को प्रतिष्ठापित करने में विश्वविद्यालय कर रहा है शक्ति को नियोजित युवाचार्य श्री महावीर कुमार ने जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय की खुलकर प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने स्वयं इसी विश्वविद्यालय से बीए किया, फिर एमए किया और बाद में जैन आगम और पर्यावरणीय संरक्षण में पीएचडी भी की और इसमें उनके गाइड कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ थे। उन्होंने बताया कि उनके अलावा इस विश्वविद्यालय से सैंकड़ों अपरिग्रही साधु-साध्वियों ने भी यहां से उच्च शिक्षा अर्जित की है। इनमें तेरापंथी साधु-साध्वियां ही नहीं, बल्कि समस्त जैन शासन के साधुओं और अन्य सम्प्रदायों के साधु-साध्वियां भी सम्मिलित हैं। जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय का अतीत गौरवशाली रहा है और इसका भविष्य भी उज्ज्वल ही रहेगा। यह जिन शासन का प्रतीक होने के साथ ही सम्पूर्ण वैश्विक विद्याओं का परिचायक है और भारतीय व जैन संस्कृति को विश्व भर में प्रसारित कर रहा है। यह अहिंसा व अनेकांत को प्रतिष्ठापित करने में अपनी शक्ति को नियोजित कर रहा है। यहां ऐसी शिक्षा दी जाती है, जो व्यक्ति को शांति प्रदान करती है। युवाचार्य ने बताया कि इस विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय संस्कृति से जुड़े विषयों के विभाग संरक्षित हैं और यह विश्वविद्यालय लगातार चुनौतियों का सामना करते हुए मानव जाति का भला कर रहा है। सत्य को जानने की उत्कंठा होने पर ही ज्ञानी बना जा सकता है इस अवसर पर युवाचार्य श्री महावीर कुमार की अभ्यर्थना व्यक्त करते हुए कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने कहा कि युवाचार्य महावीर कुुमार संयम, साधना, सेवा, अनुशासन और संतुलित स्वभाव के धनी हैं। इनमें अटूट गुरूभक्ति, जिज्ञासु दृष्टि, सत्यनिष्ठा, धैर्य और भीड़ में भी अकेले रहने के भाव की विशेषताएं समाहित हैं। प्रो. दूगड़ ने कहा कि व्यक्ति में सत्य को जानने की उत्कंठा और जितनी तीव्र इच्छा होती है, वह उतना ही ज्ञानी बन सकता है। कार्यक्रम में समणी कुसुम प्रज्ञा ने अपने वक्तव्य में बताया कि वे जैविभा विश्वविद्यालय की प्रथम छा़त्रा रही हैं और मुनिश्री महावीर कुमार को उन्होंने निकट से जाना-परखा है। उनमें पुरूषार्थ, समय-नियोजन आदि गुण भरपूर हैं। समणी संगीत प्रज्ञा ने प्राकृत भाषा में प्रो. दामोदर शास्त्री के रचित काव्य को प्रस्तुत किया। समारोह के दौरान वंदना के रूप में अथ्यर्थना का कार्यक्रम लगातार चला और विश्वविद्यालय के सभी विभागों के विभागाध्यक्षों ने भी अभिव्यक्ति दी। इनमें प्रो. बीएल जैन, प्रो. रेखा तिवाड़ी, प्रो. वंदना कुंडलिया, प्रो. जिनेन्द्र कुमार जैन, प्रो. लक्ष्मीकांत व्यास ने अपने विचार रखते हुए युवाचार्य श्री महावीर कुमार का अभिनन्दन किया। डाॅ. लिपि जैन व स्नेहा शर्मा ने छात्राओं के साथ मिलकर एक नाट्य वंदना के रूप में संवाद प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का प्रारम्भ छात्राओं के स्वागत गीत द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन प्रो. युवराज सिंह खंगारोत ने किया। इस अवसर पर जैन विश्व भारती के परिसर संयोजक डाॅ. धरमचंद लूंकड़, ट्रस्टी जयंतीलाल, प्रो. जगतराम भट्टाचार्य, रजिस्ट्रर देबाशीष गोस्वामी, उप कुलसचिव अभिनव सक्सेना, दीपाराम खोजा, पंकज भटनागर, ओएसडी प्रो. अशोक जैतावत, डाॅ. सत्यनारायण भारक्षज, डाॅ. आभासिंह, डाॅ. बलबीर सिंह चारण, डाॅ. गिरीराज भोजक, डाॅ. रामदेव साहू आदि सभी शिक्षकगण, शैक्षेत्तर कार्मिकगण तथा विद्यार्थी उपस्थित रहे।
Read more...
नैतिक मूल्यों को ग्रहण करें एवं शैक्षिक उन्नयन के लिए परिश्रम करें- आचार्यश्री महाश्रमण
29 Jul 2026
नैतिक मूल्यों को ग्रहण करें एवं शैक्षिक उन्नयन के लिए परिश्रम करें- आचार्यश्री महाश्रमण
विश्वविद्यालय के शैक्षणिक व गैर शैक्षणिक सदस्यों ने किए अनुशास्ता केे दर्शन लाडनूँ, 29 जुलाई 2026। जैन विश्वभारती संस्थान विश्वविद्यालय के अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण ने विश्वविद्यालय के सभी सदस्यों को एक परिवार के रूप में सामुहिक रूप से एक साथ एक त्याग लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय के समस्त शिक्षकगण और गैर शैक्षणिक कार्मिकों सहित समूचे स्टाफ द्वारा गुरु पूर्णिमा पर्व के उपलक्ष पर गुरुदेव के रूप में विश्वविद्यालय के अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण के दर्शन किए और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। सबने उनसे मंगलपाठ भी सुना। इस अवसर पर आचार्यश्री महाश्रमण ने सबसे आचार्य भिक्षु से प्रेरणा लेने के लिए प्रेरित प्रेरित करते हुए नैतिक मूल्यों को ग्रहण करने और अपने-अपने शैक्षिक उन्नयन के लिए परिश्रम करने पर बल दिया। इस अवसर पर कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़, कुल सचिव देबाशीष गोस्वामी, प्रो. बीएल जैन, प्रो. युवराज सिंह खंगारोत, प्रो. लक्ष्मीकांत व्यास, डॉ. लिपि जैन, डॉ. गिरीराज भोजक, डॉ. रामदेव साहू, दशरथ सिंह, पंकज भटनागर, डॉ. जेपी सिंह, निरंजन सिंह सांखला आदि उपस्थित रहे।
Read more...
Latest News