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’आचार्य मल्लिषेण सूरि कृत स्याद्वादमंजरी’ पर दस दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन

प्रायोजक- भारतीय दर्शन अनुसंधान परिषद आईसीपीआर, नई दिल्ली

आयोजक- जैनविद्या एवं तुलनात्मक धर्म तथा दर्शन विभाग, जैविभा विश्वविद्यालय

लाडनूँ, 24 दिसम्बर 2025। भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के प्रायोजकत्व में संस्थान के जैनविद्या एवं तुलनात्मक धर्म तथा दर्शन विभाग के तत्वावधान में ’आचार्य मल्लिषेण सूरि कृत स्याद्वादमंजरी’ विषयक दस दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन 15 से 24 दिसम्बर तक किया गया। कार्यशाला में उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली, छत्तीसगढ़, राजस्थान सहित देश के विभिन्न राज्यों से 40 से अधिक जैन दर्शन एवं भारतीय दर्शन के विद्वानों, प्राध्यापकों एवं शोध्यार्थियों, विद्यार्थियों आदि विद्वान प्रतिभागियों ने भाग लिया। समापन पर सभी सहभागियों को सहभागिता प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।

प्रथम दिवस-

मुख्य अतिथि: प्रो. जे.वी. शाह निदेशक, लालभाई दलपतभाई इंस्टीट्यूट आॅफ इंडोलाॅजी, अहमदाबाद

अध्यक्षता- प्रो. बच्छराज दूगड़ कुलपति, जैन विश्वभारती संस्थान

विशिष्ट अतिथि- प्रो. विजयकुमार जैन, निदेशक, भोगीलाल लहरचन्द इंस्टीट्यूट ऑफ इंडोलॉजी नई दिल्ली

‘सत्य को एकांगी दृष्टि से नहीं, बल्कि बहुआयामी रूप में समझने की आवश्यकता’

कार्यशाला का उद्घाटन शासनश्री मुनि विजयकुमार के सान्निध्य में 15 दिसम्बर को किया गया। उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि लालभाई दलपतभाई इंस्टीट्यूट ऑफ इंडोलॉजी, अहमदाबाद के निदेशक प्रो. जे.वी. शाह ने कहा कि ’स्याद्वादमंजरी’ केवल एक दार्शनिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय बौद्धिक परंपरा की तर्कशीलता और गहराई का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने अनेकांत और स्याद्वाद की दृष्टि आज वैश्विक विमर्श में भी अत्यंत प्रासंगिक बताते हुए कहा कि सत्य को एकांगी दृष्टि से नहीं, बल्कि बहुआयामी रूप में समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं युवा शोधार्थियों को शास्त्रों के गहन अध्ययन और समालोचनात्मक चिंतन के लिए प्रेरित करती हैं।

वैचारिक टकरावों के बीच स्याद्वाद दिखाता है समाज को समन्वय का मार्ग

इस अवसर पर मुनिश्री विजय कुमार ने कहा कि स्याद्वादमंजरी अनाग्रह बुद्धि का विकास करने वाला विशिष्ट ग्रंथ है। उन्होंने इस ग्रंथ को दर्शन का सारभूत ग्रंथ बताया और कहा कि यह ग्रंथ स्वयं प्रकाशित होने के साथ ही दूसरों को भी प्रकाश देता है। उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता करते हुए जैन विश्वभारती संस्थान के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने जैन विश्वभारती संस्थान को जैन विद्या को समर्पित संस्थान बताया और कहा कि स्याद्वाद जैन दर्शन की आत्मा है, जो सहिष्णुता, बहुवचनात्मकता और संवाद की संस्कृति को मजबूत करता है। आज के वैचारिक टकरावों से भरे समय में स्याद्वाद की अवधारणा समाज को संतुलन और समन्वय का मार्ग दिखा सकती है।

मिलती है भारतीय दर्शन को समझने की दृष्टि

विशिष्ट अतिथि भोगीलाल लहरचन्द इंस्टीट्यूट ऑफ इंडोलॉजी नई दिल्ली के निदेशक प्रो. विजयकुमार जैन ने कहा कि आचार्य मल्लिषेण सूरि की यह कृति जैन दर्शन के साथ-साथ समग्र भारतीय दर्शन को समझने की दृष्टि प्रदान करती है। कार्यशाला के समन्वयक प्रो. आनंदप्रकाश त्रिपाठी ने स्वागत वक्तव्य एवं अतिथि परिचय प्रस्तुत करते हुए बताया कि दस दिनों तक चलने वाली इस राष्ट्रीय कार्यशाला में स्याद्वादमंजरी के दार्शनिक, तार्किक एवं तुलनात्मक पक्षों पर विस्तार से विमर्श किया जा रहा है। कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञ विद्वानों द्वारा व्याख्यान, पाठ-वाचन, विमर्श सत्र तथा शोधपरक चर्चाएं आयोजित होंगी। अतिथियों का स्वागत प्रो. जिनेन्द्र कुमार जैन, प्रो. बी.एल. जैन, प्रो. लक्ष्मीकांत व्यास आदि ने किया। कार्यक्रम का संयोजन डाॅ. सत्यनारायण भारद्वाज ने एवं आभार ज्ञापन डाॅ. रामदेव साहू ने किया। सामूहिक राष्ट्रगान के साथ समारोह का समापन हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ मुमुक्षु शैफाली के मंगलाचरण से किया गया।

द्वितीय दिवस-

मुख्य अतिथि: प्रो. धर्मचन्द जैन, जैन दर्शन के प्रख्यात विद्वान् एवं पूर्व विभागाध्यक्ष, जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर

विशिष्ट विद्वान- प्रो. जिनेन्द्र कुमार जैन, विभागाध्यक्ष, प्राकृत एवं संस्कृत विभाग एवं प्रो. सुषमा सिंघवी पूर्व अध्यक्ष, राजस्थान संस्कृत अकादमी

‘किसी भी वस्तु या सत्य का पूर्ण बोध अनेक नयों के समन्वय से ही संभव’

दस दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला के द्वितीय दिवस 16 दिसम्बर को जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं जैन दर्शन के प्रख्यात विद्वान् प्रो. धर्मचन्द जैन ने आचार्य मल्लिषेण सूरि कृत ‘स्याद्वादमंजरी’ की कारिका पांच एवं छह पर सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए ग्रंथ की दार्शनिक गहराई, तर्क-पद्धति और समन्वयकारी दृष्टि को स्पष्ट किया। प्रो. जैन ने कहा कि स्याद्वाद जैन दर्शन की मौलिक देन है। कारिका पांच के माध्यम से उन्होंने प्रतिपादित किया कि किसी भी वस्तु या सत्य का पूर्ण बोध अनेक नयों के समन्वय से ही संभव है। वहीं कारिका छह की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि स्याद्वाद का उद्देश्य विरोध नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व और बौद्धिक उदारता को स्थापित करना है। उदाहरणों के माध्यम से रेखांकित करते हुए उन्होंने स्याद्वाद को केवल दार्शनिक सिद्धांत नहीं, बल्कि व्यावहारिक जीवन में संवाद, सहिष्णुता और सामाजिक समरसता का मार्ग प्रशस्त करने वाला बताया। आधुनिक संदर्भों में इसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए प्रो. जैन ने कहा कि आज के वैचारिक टकरावों के युग में स्याद्वाद एक संतुलित और समावेशी दृष्टिकोण प्रदान करता है। इससे पूर्व प्राकृत एवं संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. जिनेन्द्र कुमार जैन ने स्याद्वादमंजरी की विषयवस्तु पर विस्तृत व्याख्यान दिया। व्याख्यान के दौरान शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों ने जिज्ञासापूर्ण प्रश्न रखे, जिनका व्याख्यानकर्ताओं ने तर्कपूर्ण एवं सरल शैली में समाधान प्रस्तुत किया। राजस्थान संस्कृत अकादमी की पूर्व अध्यक्ष प्रो. सुषमा सिंघवी विशेष रूप से उपस्थित रही। कार्यशाला के समन्वयक प्रो. आनन्दप्रकाश त्रिपाठी ने प्रारम्भ में स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संयोजन श्रीमती इर्या जैन ने किया।

तृतीय दिवस-

मुख्य वक्ता- प्रख्यात विदुषी प्रो. सुषमा सिंघवी, पूर्व अध्यक्ष, राजस्थान संस्कृत अकादमी

शिष्ट विद्वान्- प्रो. कमलेश कुमार जैन

स्याद्वाद सह-अस्तित्व, सहिष्णुता और समन्वय की दार्शनिक भूमि प्रदान करता है

’दस दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला’ के तृतीय दिवस 17 दिसम्बर को हुए प्रथम सत्र में राजस्थान संस्कृत अकादमी की पूर्व अध्यक्ष व प्रख्यात विदुषी प्रो. सुषमा सिंघवी ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने गहन एवं विचारोत्तेजक व्याख्यान में ’स्याद्वादमंजरी’ की कारिका एक से चार तक का क्रमबद्ध और दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया। प्रो. सिंघवी ने कहा कि आचार्य मल्लिषेण सूरि द्वारा रचित ’स्याद्वादमंजरी’ जैन न्याय और तर्क परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो स्याद्वाद की सूक्ष्मता, बहुआयामी दृष्टिकोण और सत्य की सापेक्षता को सुदृढ़ रूप में स्थापित करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्याद्वाद केवल तर्क-वितर्क की पद्धति नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व, सहिष्णुता और समन्वय की दार्शनिक भूमि प्रदान करता है। कारिकाओं के माध्यम से आचार्य मल्लिषेण ने विरोधाभास प्रतीत होने वाले दृष्टिकोणों के मध्य संतुलन स्थापित करने की अद्भुत क्षमता प्रदर्शित की है, जो आज के वैचारिक संघर्षों से भरे समाज में अत्यंत प्रासंगिक है। इस अवसर पर जैन दर्शन के विशिष्ट विद्वान् प्रो. कमलेश कुमार जैन ने भी स्याद्वाद मंजरी की विभिन्न कारिकाओं की मीमांसा की। व्याख्यान के दौरान शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों ने जिज्ञासापूर्ण प्रश्न रखे, जिनका तर्कपूर्ण एवं सरल शैली में प्रो. सिंघवी ने समाधान प्रस्तुत किया। कार्यशाला के समन्वयक प्रो. आनन्दप्रकाश त्रिपाठी ने प्रारम्भ में प्रो. सुषमा सिंघवी का सम्मान किया। कार्यक्रम का संयोजन श्रीमती इर्या जैन ने किया। कार्यक्रम व्यवस्थाओं में डॉ. रामदेव साहू, डाॅ. मनीषा जैन, डाॅ. सुनीता इंदोरिया, विरोस सिंह बाघेल आदि का सराहनीय सहयोग रहा।

चतुर्थ दिवस-

मुख्य वक्ता- प्रो. प्रद्युम्न सिंह शाह, विभागाध्यक्ष, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

विशिष्ट विद्वान- प्रो. महानन्द झा, श्रीलाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

‘स्याद्वाद का सिद्धांत संवाद, सहअस्तित्व और शांति का है मजबूत आधार’

 

राष्ट्रीय कार्यशाला के अन्तर्गत 18 दिसम्बर को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर प्रो. प्रद्युम्न सिंह शाह ने स्याद्वादमंजरी की कारिका नौ से बारह पर विस्तृत एवं गंभीर व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने स्याद्वादमंजरी के दार्शनिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह ग्रंथ जैन दर्शन की तर्कपरकता, बहुविध दृष्टिकोण और बौद्धिक उदारता का उत्कृष्ट उदाहरण है। प्रो. शाह ने कारिका नौ की व्याख्या करते हुए बताया कि स्याद्वाद का मूल उद्देश्य किसी भी वस्तु या तत्त्व के एकांगी निर्णय से बचना है। वस्तु का स्वरूप अनेक दृष्टियों से देखा जाना चाहिए, तभी उसका सम्यक् बोध संभव है। कारिका दस के संदर्भ में उन्होंने नय और प्रमाण के अंतर को स्पष्ट किया। प्रो. शाह के अनुसार, नय किसी वस्तु के आंशिक सत्य को ग्रहण करता है, जबकि प्रमाण समग्र सत्य की ओर संकेत करता है। स्याद्वाद इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करता है, जिससे दार्शनिक मतभेदों में संवाद और सहिष्णुता का मार्ग प्रशस्त होता है। व्याख्या करते हुए प्रो. शाह ने स्याद्वाद को समकालीन वैश्विक संदर्भों से जोड़ते हुए कहा कि आज के बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक समाज में जैन दर्शन का यह सिद्धांत संवाद, सहअस्तित्व और शांति का मजबूत आधार बन सकता है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक चेतना और बौद्धिक विनम्रता का दर्शन बताया। श्रीलाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के प्रो. महानन्द झा ने स्याद्वादमंजरी की दार्शनिक व्याख्या करते हुए विश्लेषण किया। इससे पूर्व कार्यशाला के समन्वयक प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने प्रो. सिंह व प्रो. झा का स्वागत-अभिनंदन किया। प्रश्नोत्तर सत्र में शोधार्थियों एवं प्राध्यापकों ने स्याद्वाद की व्यावहारिक उपयोगिता और अन्य दर्शनों से उसके तुलनात्मक पक्षों पर प्रश्न किए, जिनका प्रो. शाह ने संतोषजनक उत्तर दिया। कार्यक्रम का संयोजन श्रीमती ईर्या जैन ने एवं आभार ज्ञापन डाॅ. रामदेव साहू ने किया।

पंचम दिवस-

मुख्य वक्ता- प्रो. महानन्द झा, वरिष्ठ आचार्य एवं दार्शनिक, श्रीलाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

‘वैचारिक विरोधों के समाधान का मार्ग दिखाता है स्याद्वाद दर्शन’

राष्ट्रीय कार्यशाला के अकादमिक सत्र में 19 दिसम्बर को श्रीलाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के वरिष्ठ आचार्य एवं दार्शनिक प्रो. महानन्द झा ने ’स्याद्वादमंजरी’ की कारिका 13 से 16 तक की गहन व्याख्या एवं मीमांसा करते हुए दिए व्याख्यान में प्रो. झा ने कहा कि ’स्याद्वादमंजरी’ जैन दर्शन का ऐसा महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, जो न केवल तर्क और ज्ञानमीमांसा की दृष्टि से समृद्ध है, बल्कि समकालीन वैचारिक संघर्षों के समाधान की दिशा भी प्रदान करता है। प्रो. झा ने कहा कि इसमें एकांगी दृष्टिकोण की सीमाओं को रेखांकित किया गया है। किसी भी वस्तु या सत्य को केवल एक ही पक्ष से देखने पर भ्रम और विवाद उत्पन्न होते हैं। स्याद्वाद इस एकांगी दृष्टि का निषेध करते हुए अनेक दृष्टियों से सत्य के अवलोकन पर बल देता है। उन्होंने कहा कि यह कारिका नयवाद और स्याद्वाद के आपसी संबंध को स्पष्ट करती है। नय किसी वस्तु के एक पक्ष को ग्रहण करता है, जबकि स्याद्वाद उन सभी नयों का समन्वय कर समग्र सत्य तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करता है। प्रो. झा ने बताया कि यहां विरोधी प्रतीत होने वाले कथनों के सामंजस्य की दार्शनिक पद्धति प्रस्तुत की गई है। स्याद्वाद यह स्वीकार करता है कि भिन्न-भिन्न दृष्टियों से एक ही वस्तु के बारे में परस्पर विरोधी कथन भी सापेक्ष रूप से सत्य हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि स्याद्वाद को बौद्धिक सहिष्णुता और संवाद की दार्शनिक भूमि प्रदान करती है। प्रो. झा ने कहा कि ’स्याद्वादमंजरी’ केवल जैन दर्शन का ग्रंथ नहीं, बल्कि यह मानवता को बहुआयामी चिंतन, सह-अस्तित्व और संवाद की संस्कृति सिखाने वाला दर्शन है। सत्र के दौरान उपस्थित शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों ने विषय पर प्रश्नोत्तर के माध्यम से गहन संवाद किया। इससे पूर्व कार्यशाला के समन्वयक प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने प्रो झा का सम्मान किया। कार्यक्रम का संयोजन श्रीमती इर्या जैन ने किया।

षष्टम् दिवस-

मुख्य वक्ता- प्रो. जयकुमार जैन, वरिष्ठ आचार्य एवं प्रख्यात विद्वान

‘असहिष्णुता के दौर में समाज को संतुलन और विवेक की दिशा देता है स्याद्वाद का दर्शन’

राष्ट्रीय कार्यशाला के अंतर्गत 20 दिसम्बर को वरिष्ठ आचार्य एवं प्रख्यात विद्वान प्रो. जयकुमार जैन ने ग्रंथ की कारिका 17 से 20 तक की विस्तृत व्याख्या एवं तात्त्विक मीमांसा प्रस्तुत की। प्रो. जयकुमार जैन ने अपने वक्तव्य में कहा कि ’स्याद्वादमंजरी’ जैन दर्शन की तार्किक परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो अनेकांतवाद और स्याद्वाद की सूक्ष्म अवधारणाओं को स्पष्ट करता है। उन्होंने बताया कि आचार्य मल्लिषेण सूरि ने विरोधी दर्शनों की आपत्तियों का सशक्त तर्कों से खंडन करते हुए स्याद्वाद की वैचारिक सुदृढ़ता को प्रमाणित किया है। उन्होंने कारिका 17 की व्याख्या करते हुए कहा कि इसमें ज्ञान की सापेक्षता और वस्तु के अनेक पक्षों की स्वीकार्यता को रेखांकित किया गया है। वहीं कारिका 18 और 19 में एकांगी दृष्टिकोण की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए अनेकांत दृष्टि की आवश्यकता पर बल दिया गया है। कारिका 20 की मीमांसा में प्रो. जैन ने स्याद्वाद को केवल दार्शनिक सिद्धांत न मानकर व्यवहारिक जीवन में सहिष्णुता, संवाद और समन्वय का आधार बताया। उन्होंने कहा कि आज के वैचारिक टकराव और असहिष्णुता के दौर में ’स्याद्वादमंजरी’ का दर्शन समाज को संतुलन और विवेक की दिशा प्रदान कर सकता है। सत्र के दौरान प्रश्नोत्तर में शोधार्थियों ने ग्रंथ की समकालीन प्रासंगिकता पर जिज्ञासाएं रखीं, जिनका प्रो. जैन ने तार्किक एवं सरल शैली में समाधान किया। कार्यशाला के समन्वयक प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने प्रो. जैन का सम्मान किया। कार्यक्रम का संयोजन श्रीमती इर्या जैन ने किया। अंत में आभार ज्ञापन डॉ. मनीषा जैन ने किया।

सप्तम् दिवस-

मुख्य वक्ता- प्रो. श्रेयांस कुमार सिंघई

संवाद और सह-अस्तित्व को मजबूत आधारशिला प्रदान करता है स्याद्वाद- प्रो. सिंघी

राष्ट्रीय कार्यशाला के अंतर्गत 21 दिसम्बर के अकादमिक सत्र में प्रो. श्रेयांस कुमार सिंघई ने ‘स्याद्वादमंजरी’ की कारिका 21 से 24 तक की गहन व्याख्या एवं तात्त्विक मीमांसा प्रस्तुत की। व्याख्यान में प्रो. सिंघई ने स्याद्वाद के दार्शनिक आधारों को स्पष्ट करते हुए बताया कि कारिका 21 से 24 के माध्यम से आचार्य मल्लिषेण सूरि बहुविध सत्य की अवधारणा को तार्किक एवं व्यवस्थित रूप में प्रतिपादित करते हैं। उन्होंने कहा कि स्याद्वाद न केवल जैन दर्शन की मौलिक देन है, बल्कि यह भारतीय दर्शन की सहिष्णुता, समन्वय और बौद्धिक उदारता का सशक्त उदाहरण भी है। प्रो. सिंघई ने इन कारिकाओं की व्याख्या करते हुए प्रतिपादित किया कि विभिन्न नयों और संदर्भों से किया गया विचार ही सम्यक् ज्ञान की ओर ले जाता है। उन्होंने समकालीन दार्शनिक विमर्श में स्याद्वाद की प्रासंगिकता पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि आज के बहुलतावादी समाज में यह दर्शन संवाद और सह-अस्तित्व की मजबूत आधारशिला प्रदान करता है। अकादमिक सत्र के दौरान शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों ने विषय से संबंधित जिज्ञासाएं प्रस्तुत कीं, जिनका प्रो. सिंघई ने संतुलित एवं तर्कसंगत समाधान किया। विभागाध्यक्ष एवं आयोजकों ने बताया कि इस प्रकार के शास्त्रीय ग्रंथों पर केंद्रित कार्यशालाएं न केवल शोध को नई दिशा देती हैं, बल्कि भारतीय दर्शन की समृद्ध परंपरा को समझने में भी सहायक सिद्ध होती हैं। कार्यशाला के इस सत्र ने ‘स्याद्वादमंजरी’ के गूढ़ दार्शनिक पक्षों को सरल एवं बोधगम्य रूप में प्रस्तुत कर प्रतिभागियों को गहन चिंतन के लिए प्रेरित किया। इससे पूर्व कार्यशाला के समन्वयक प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने प्रो. सिंघई का स्वागत किया। कार्यक्रम का प्रारंभ संगीता शाह के मंगलाचरण से किया गया। कार्यक्रम का संयोजन डाॅ. ईर्या जैन ने किया।

अष्टम् दिवस-

प्रमुख वक्ता- प्रो. अनेकांत जैन, प्रख्यात विद्वान व प्रोफेसर, लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विश्वविद्यालय दिल्ली।

‘जैन दर्शन की मौलिक देन के साथ समकालीन विमर्श, संवाद और सहिष्णुता के लिए है स्याद्वाद’

 

राष्ट्रीय कार्यशाला में आचार्य मल्लिषेण सूरि कृत ’स्याद्वादमंजरी’ विषय पर हो रहे विभिन्न विद्वानों के व्याख्यानों में 22 दिसम्बर को लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विश्वविद्यालय दिल्ली के प्रख्यात विद्वान प्रो. अनेकांत जैन ने ’स्याद्वादमंजरी’ की दार्शनिक मीमांसा करते हुए कारिका 25 से 28 तक का गहन एवं सुबोध अध्यापन करवाया। उन्होंने स्याद्वाद दर्शन की तर्क-पद्धति, बहुपक्षीय दृष्टिकोण तथा सत्य की सापेक्षता को उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया। प्रो. जैन ने बताया कि स्याद्वाद न केवल जैन दर्शन की मौलिक देन है, बल्कि यह समकालीन विमर्श, संवाद और सहिष्णुता के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है। कार्यशाला में उपस्थित शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं अध्येताओं ने विषय पर अपनी जिज्ञासाएं भी व्यक्त की, जिनका प्रो. जैन ने शास्त्रीय एवं व्यावहारिक दृष्टि से समाधान किया। विभागाध्यक्ष एवं आयोजन समिति के समन्वयक प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने प्रारम्भ में अतिथि वक्ता का स्वागत किया एवं अंत में आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे व्याख्यान जैन दर्शन के गहन अध्ययन और शोध को नई दिशा प्रदान करते हैं। इससे पूर्व दिल्ली से आयी अनुप्रेक्षा जैन द्वारा प्रस्तुत मंगलाचरण से कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। कार्यक्रम का संयोजन सहायक आचार्य श्रीमती ईर्या जैन ने किया।

नवम् दिवस-

प्रमुख वक्ता- प्रो प्रो. अनेकांत जैन, प्रख्यात विद्वान व प्रोफेसर, लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत विश्वविद्यालय दिल्ली एवं प्रो. योगश कुमार जैन।

‘नित्य एकांतवाद को स्वीकार करने पर कर्म व्यवस्था होती है बाधित’

राष्ट्रीय कार्यशाला में 23 दिसम्बर को आयोजित सत्र में मुख्य वक्ता प्रो. अनेकांत जैन ने स्याद्वादमंजरी की 27वीं कारिका के अवशिष्ट अंश को बताने के उद्देश्य से बन्ध मोक्ष की पृष्ठभूमि को प्रस्तुत किया। इसके बाद बन्ध के स्वरूप और जीव एवं आत्मा के सम्बन्ध को मूर्तत् एवं अमूर्तत् का सम्बन्ध बताते हुए कर्मबंध का जीव के साथ सम्बन्ध भी विश्लेषित किया। कर्म का उदय ही बन्ध की आधारशिला है, यह बताते हुए उन्होंने कर्मपरमाणुओं के विषय में जानकारी प्रदान की तथा बताया कि कर्म-परमाणुओं में कुछ परमाणु ही कर्म बनने की योग्यता रखते हैं और वे ही जीव शरीरस्थ आत्मा से संपृक्त हो जाते हैं अतः जीव कर्मबन्ध से ग्रस्त हो जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि हम नित्य एकान्तवाद को स्वीकार कर लेते हैं तो कर्म व्यवस्था बाधित हो जायेगी। उन्होंने कर्मचेतना तथा कर्मफलचेतना के विषय का भी प्रतिपादन किया। साथ ही कर्मवासना तथा कर्मसंतति की भी विवेचना की। अंत में जैन दार्शनिक चिंतन को प्रस्तुत करते हुए आपने कहा कि आत्मा को परिणामी नित्य मानने पर उक्त दोष संभव नहीं होंगे। कार्यशाला में प्रो. योगेश कुमार जैन ने स्याद्वादमंजरी की 29वीं गाथा के सन्दर्भ में जीव तत्त्व की विस्तृत विवेचना की तथा ग्रंथकार के आशय को स्पष्ट करते हुए उन्होंने जीव के संख्यात या असंख्यात होने के बारे में जीव को संख्यात मानने पर संभावित दोषों का प्रतिपादन करते हुए बताया कि जैन मतानुसार जीव संख्यात नहीं माने जा सकते, क्योंकि यदि जीव संख्यात हों तो किसी समय में सब जीवों का मोक्ष हो जाने पर संसार को जीवरहित हो जाना चाहिए, पर ऐसा कभी नहीं हो सकता। कर्मचक्र से बंधा हुआ जीव ही पुनर्जन्म को प्राप्त करता है। कर्म से थोड़ा भी संसक्त होने पर मुक्त जीव भी पुनर्जन्म को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार कर्मचक्र के समानांतर संसारचक्र निरंतर सक्रिय रहता है। जीवों के असंख्यात होने से कुछ जीवों के मुक्त हो जाने पर भी संसार की सक्रियता बाधित नहीं होती। अंत में जीव के अस्तित्व के विषय में आधुनिक जीव वैज्ञानिकों की अवधारणाओं को प्रस्तुत करते हुए जैन मत से उनकी अनुकूलता भी प्रतिपादित की। प्रो. अनेकांत जैन ने स्याद्वादमंजरी की 30वीं कारिका का वाचन करवाया। तत्पश्चात् जैनेतर शास्त्रों के प्रतिपाद्य में शास्त्रकारों की पक्षपातपूर्ण स्थिति को समझाते हुए आपने कहा कि पक्षपातपूर्ण चिंतन को किसी भी स्थिति में सम्यक् चिंतन नहीं कहा जा सकता। अंत में ‘समय’ शब्द की भी विशेष व्याख्या प्रस्तुत कर आचार्य के अभिप्राय को स्पष्ट किया तथा बताया कि समय शब्द के छह अर्थ हैं- काल, परिस्थिति, संकेत, सिद्धांत, शास्त्र एवं अवसर। अगले सत्र में प्रो. योगेश कुमार जैन ने स्याद्वादमंजरी की गाथा 31 एवं 32 का युगापद् वाचन किया तथा बताया कि इकतीसवीं गाथा में आचार्य मल्लिषेण ने मूल गाथाकार आचार्य हेमचन्द्र के प्रति अपनी सद्भावना व्यक्त की है तथा अपनी सफलता की कामना भी व्यक्त की है। इसमें भावना तत्त्व का विशेष महत्व बताते हुए उन्होंने बताया कि मन को केन्द्रित करने से भावना स्थायी एवं बलवती होती है। उन्होंने कार्य की सफलता के सम्बन्ध में आपने पांच हेतुओं- स्वभाव, पुरुषार्थ, निमित्त, भवितव्यता तथा काल की चर्चा भी की। बौद्ध मत को प्रस्तुत करते हुए ज्ञान एवं अज्ञान दोनों को दुःख का कारण मानने की पर्याप्त आलोचना की तथा दुःख के चार प्रमुख कारणों अहंभाव, मत्सरभाव, रागादिभाव तथा अज्ञान की समालोचना करते हुए कहा कि सुख-दुःख के ज्ञानाभाव में सुख-दुःख की वेदना भी नहीं होती, अतः परिमित ज्ञान होना चाहिए, इस बौद्ध मत को अनुपयुक्त बताया तथा कहा कि जैन मतानुसार भेदज्ञान तथा अभेदज्ञान के लिए प्रयत्न अनिवार्य है। 32वीं गाथा के सन्दर्भ में कहा कि अन्य मतवादी जिन्हें अन्यतीर्थिक कहा हंैं, वे आचार्य की दृष्टि में ऐन्द्रजालिक हैं। वे केवल भ्रम उत्पन्न करने वाले हैं। जिससे, सत्य तो छिपा रहता है तथा असत्य को ही सत्य समझ लिया जाता है।

दशम् दिवस-

प्रमुख वक्ता- प्रो. दामोदर शास्त्री

‘सब सिद्धांतों का समन्वित मार्ग है अनेकांतवाद’

जैनविद्या एवं तुलनात्मक धर्म तथा दर्शन विभाग के अध्यक्ष प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी की अध्यक्षता में 24 दिसम्बर को संपन्न इस सत्र में मुख्य वक्ता प्रो. दामोदर शास्त्री ने स्याद्वादमंजरी के वैशिष्ट्य पर चर्चा करते हुए सर्वप्रथम स्याद्वाद के लक्ष्य का प्रतिपादन किया। उन्होंने बताया कि ज्ञान को परिपूर्ण बनाना ही स्यादवाद का लक्ष्य है। हम ज्ञान की अपरिपूर्णता के कारण परस्परस्पर्धितकंटकेषु की स्थिति में पहुंच कर एक दूसरे का विरोध करते हैं, जो हमारी अज्ञानता को ही प्रकट करता है। उन्होंने स्याद्वाद की परम्परा पर गाथा 25 के अंश “निपीततत्त्व- सुधोद्गतोद्गारपरम्परेयं” की व्याख्या की। इसके बाद आस्तिक एवं नास्तिक के विषय में व्यापक चर्चा करके जैन मत की आस्तिकता को सिद्ध किया। हेमचन्द्र के विशिष्ट मत का प्रतिपादन करते हुए आपने योग को मोक्ष का सर्वश्रेष्ठ उपाय बताया। ब्रह्म एवं द्रव्य के सादृश्य को बता कर आपने पदार्थ ज्ञान एवं आत्मज्ञान में समान पद्धति को अपनाने का भी औचित्य उपस्थापित किया। उन्होंने योग का दूसरा अर्थ ‘अप्राप्तस्य प्राप्तिः योगः’ में अप्राप्त का अर्थ वीतरागता को बता कर योग एवं तप में समन्वय का भी प्रतिपादन किया। उन्होंने द्रव्य को भी नए रूप में परिभाषित किया कि द्रव्य त्रैकालिक पर्यायों का पिंड ह,ै जिसमें निरंतर पर्यायों का परिणमन होता रहता है। जैसे ही पूर्व पर्याय का नाश होता है, वैसे ही नए पर्याय का जन्म हो जाता है। द्रव्य में कुछ त्रैकालिक पर्याय भी होते हैं जो द्रव्य के अस्तित्व को बनाए रखते हैं। प्रो. शास्त्री ने कहा कि हम एक काल एक क्षेत्र एक भाव तथा एक द्रव्य का ही अनुभव कर सकते हैं, किन्तु त्रैकालिक को हम देख नहीं सकते। पर्यायों में भी स्थूल पर्याय को देख सकते हैं, सूक्ष्म पर्याय को नहीं देख सकते। अगले सत्र के मुख्य वक्ता प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी ने स्याद्वादमंजरी का सारांश प्रस्तुत करते हुए बौद्ध क्षणिकवाद की मीमांसा की और आधुनिक यथार्थवाद की दृष्टि से इसकी समालोचना करके बताया कि बौद्ध मत भले ही एकान्तिक हो पर उससे यह सिद्ध होता है कि परिवर्तन ही सत्य है तथा कोई भी तत्त्व या द्रव्य शाश्वत नहीं है। जैन मत के अनुसार इसमें आपत्ति का प्रतिपादन करते हुए उन्होंने कहा कि यदि ऐसा मानेंगे तो सम्पूर्ण लोकव्यवहार ही नष्ट हो जाएगा। उन्होंने बताया कि बौद्ध मत के विरुद्ध कर्मवाद को प्रतिष्ठापित करना ही आचार्य मल्लिषेण का मुख्य उद्देश्य रहा है। उन्होंने अकृतकर्मभोगः तथा कृतप्रणाशः आदि विशेषण पदों की भी विवेचना करते हुए आचार्य द्वारा प्रस्तुत आपत्ति के विषय में चिंतन की प्रस्तुति दी और कहा कि तीन दोष भवभंग दोष, मोक्षभंग दोष तथा स्मृतिभंग दोष बताए गए हैं। चार आर्य सत्यों का प्रतिपादन करते हुए उन्होंने नित्यत्ववाद के द्वारा प्रतिपादित ‘त्रिकालाबाधितं सत्’ सिद्धांत की समालोचना प्रस्तुत की और जैन दर्शन द्वारा मान्य ‘उत्पादव्ययध्रौव्यात्मकं सत्’ की युक्तियुक्तता प्रतिपादित करते हुए अनेकांतवाद की शैली की उपयुक्तता बताते हुए आग्रह दृष्टि के विनाश हेतु अनेकान्तवाद को पर्याप्त व्यवहारोपयोगी बताया। अंत में अनेकान्तवाद को सब सिद्धांतों का समन्वित मार्ग बताया तथा कहा कि यह यथार्थवादी दृष्टिकोण को विकसित करता है, जिसकी वर्त्तमान चिंतनधारा के विकास हेतु अत्यंत आवश्यकता है।

समापन समारोह -

मुख्य अतिथि- प्रो. पवन कुमार शर्मा, समन्वयक, भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली।

अध्यक्षता- प्रो. बच्छराज दूगड़, कुलपति, जैविभा विश्वविद्यालय, लाडनूं।

ग्राह्य ज्ञान को किया जाए व्यवहार में क्रियान्वित

कार्यशाला का समापन सत्र संस्थान के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ की अध्यक्षता में हुआ। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार (नई दिल्ली) के समन्वयक प्रो. पवन कुमार शर्मा थे। मुख्य अतिथि प्रो. शर्मा ने कार्यशाला से ग्राह्य ज्ञान को व्यवहार में क्रियान्वित करने का आह्वान किया। कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने अध्यक्षीय वक्तव्य प्रस्तति किया। इस अवसर पर कुलपति एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि द्वारा 31 सहभागियों को सहभागिता प्रमाणपत्र प्रदान किये गये। इस अवसर पर कार्यशाला के सहभागियों में से सुमन बंसल, अनमोल सांगल तथा स्वर्णा अशोक जैन ने कार्यशाला के अनुभवों से अवगत कराया। इससे पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी ने कार्यशाला के प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का प्रारम्भ डा. सुरभि जैन एवं सुश्री शुचि जैन के मंगलगान से किया गया। जैन विद्या एवं तुलनात्मक धर्म तथा दर्शन विभाग की प्रोफेसर समणी ऋजुप्रज्ञा ने स्वागत वक्तव्य प्रस्तति किया। कार्यक्रम की संयोजिका सहायक आचार्या श्रीमती ईर्या जैन ने किया।

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